जी हाँ मेने सभी धार्मिक प्रतीकों की अनदेखी की है उस समय जब में ये लेख लिख रहा हूँ। क्योंकि इस विषय पर लिखने वाले और पढ़ने वाले को सबसे पहले धर्म हटाना होगा अन्यथा यहाँ कुछ हाथ लगने वाला नहीं। ये बहस तुम्हारे मस्तिष्क में उपजाए गए ईश्वर की परिकल्पनाओं से परे है। यदि तुम उनमें से हो जिनके मस्तिष्क में ईश्वय शिशु होने से वयस्क होने की अवधि में परिजनों और समाज द्वारा घड़ दिए जाते है तो तुम्हे इस लेख में कुछ प्राप्त नहीं होने वाला। ईश्वर मस्तिष्क में घड़ कर ह्रदय में निवास नहीं कराए जाते। ईश्वर का अनुभव तो ह्र्दय में उत्पन्न होकर सृष्टि में फैलता है। यदि तुम्हें ईश्वर का अनुभव ह्रदय में हुआ तो आगे पढ़ना वरना मस्तिष्क में उत्पन्न ईश्वरीय कल्पनाओं वाले किसी व्यक्ति के लिए मंदिर, मठ, गिरिजा, मस्जिद, मदरसे खुले हैं, वहाँ जाकर अपना मस्तिष्क जमीन से मिलाओ। यह लेख ह्रदय में ईश्वर के अनुभवों को लेकर जीने वालों के लिए है। मेरे लिए भारतीय होने के क्या अर्थ हैं ? भारतीय वह है जो जीवन का प्रत्येक क्षण उत्सव में जीता है। भारतीय जीवन व्यवस्था समय के अनुसार संसार की सबसे प्रौढ़ परंतु स्वयं जीव...