जी हाँ मेने सभी धार्मिक प्रतीकों की अनदेखी की है उस समय जब में ये लेख लिख रहा हूँ। क्योंकि इस विषय पर लिखने वाले और पढ़ने वाले को सबसे पहले धर्म हटाना होगा अन्यथा यहाँ कुछ हाथ लगने वाला नहीं। ये बहस तुम्हारे मस्तिष्क में उपजाए गए ईश्वर की परिकल्पनाओं से परे है। यदि तुम उनमें से हो जिनके मस्तिष्क में ईश्वय शिशु होने से वयस्क होने की अवधि में परिजनों और समाज द्वारा घड़ दिए जाते है तो तुम्हे इस लेख में कुछ प्राप्त नहीं होने वाला। ईश्वर मस्तिष्क में घड़ कर ह्रदय में निवास नहीं कराए जाते। ईश्वर का अनुभव तो ह्र्दय में उत्पन्न होकर सृष्टि में फैलता है। यदि तुम्हें ईश्वर का अनुभव ह्रदय में हुआ तो आगे पढ़ना वरना मस्तिष्क में उत्पन्न ईश्वरीय कल्पनाओं वाले किसी व्यक्ति के लिए मंदिर, मठ, गिरिजा, मस्जिद, मदरसे खुले हैं, वहाँ जाकर अपना मस्तिष्क जमीन से मिलाओ। यह लेख ह्रदय में ईश्वर के अनुभवों को लेकर जीने वालों के लिए है।
मेरे लिए भारतीय होने के क्या अर्थ हैं ?
भारतीय वह है जो जीवन का प्रत्येक क्षण उत्सव में जीता है। भारतीय जीवन व्यवस्था समय के अनुसार संसार की सबसे प्रौढ़ परंतु स्वयं जीवन शैली के अनुसार नवीनतम व्यवस्था है। हमारे पूर्वजों ने हज़ारो वर्षों में इस जीवन शैली को इस स्तर तक पंहुचा दिया जहाँ जीवन का अर्थ ही उत्सव हो गया। एक तरफ जब दुनिया हर्ष, उल्लास की खोज में अंधाधुंध दोहन, तीन सौ पेंसठ दिनो को नाम दे देकर थक गई मगर उत्सव ना खोज सकी। हमारे पूर्वज जीवन के प्रत्येक क्षण को उत्सव हज़ारों साल पहले ही बनाकर हमें उपहार में दे चुके हैं।
भारतीय व्यकि के लिए जन्म एक उत्सव है, माता पिता की सेवा एक उत्सव है, मित्र मंडली में बैठकर बातों बातों में पूरी दुनिया घूम आना एक उत्सव है, हमारे रेल के सफर उत्सव है, हम भारतीय तो राशन की लाइन में खड़े होने तक को उत्सव बना डालते हैं, हमारे यहाँ दादा दादी की कहानियां सुन्ना उत्सव है, पोते पोतियों को गोद मे खिलाना और उनके तोतले बोल उत्सव हैं, अध्यापक से डांट और दण्ड खाकर दोस्तों में ये बताना की दस की जगह पांच डंडे लगे ये भी उत्सव है, नॉकरी मिलना हो या दुकान का मुहूर्त होना उत्सव है, परीक्षा में पास होना तो उत्सव है मगर फेल हो जाने पर अगले साल उत्तीर्ण होने की प्रतिज्ञा लेना उत्सव है, पडौस में शादी में जाना उत्सव है, बुलावा ना होने पर भी सिर्फ सॉज सजावट देखकर मन का आनंदित होना उत्सव है, किसी महान व्यक्तित्व मिलना उत्सव है, बड़ों के सामने हाथ बांधकर खड़े हो जाना हो या अपने से छोटों को अपने अनुभव बताना उत्सव है, मेहमान आने की खबर लग जाना उत्सव है, मेहमान घर आ जाना तो महा उत्सव है, यूँ ही किसी के यहाँ नल या सबमर्सिबल के लिए जमीन की खुदाई होते देखना उत्सव है, बिना मांगे राय देना उत्सव है, चाय की दुकान पर झुंड लगाकर अपने देश ही नही बल्कि पूरे विश्व की राजनैतिक परिस्तिथियों की विवेचना सुनना सुनाना उत्सव है, जो पसंद ना हो उसकी जी भर के बुराई करना उत्सव है, मुहल्ले में होने वाली लड़ाइयों को छज्जे पर खड़े होकर देखना उत्सव है, दूसरे धर्म की पहचान रखने वाले दोस्त को परिवार के निजी कार्यक्रमों में सम्मिलित करना उत्सव है, शादी बियाह के निमंत्रण पत्र लेकर घर घर जाना उत्सव है, इलेक्शन के समय पार्टियों का समर्थन और विरोध पर चर्चाएं करना उत्सव है, तेहरवीं चौदहवीं की दावत उड़ाना उत्सव है, पुराने अध्यापको के सामने आज हाथ जोड़कर खड़े हो जाना उत्सव है...........
भारतीय समाज का में पैदा होने ना गर्व की बात है ना रोष की बात है बल्कि उत्सव की बात है। हम भारतीयों की जीवन शैली उत्सव शैली है। हमारे पूर्वजों ने जीवन को उस जगह लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ जीवन का प्रत्येक क्षण उत्सव है। भारतीय जीवन व्यवस्था में एक क्षण भी ऐसा नहीं जो उत्सव ना हो। एक भी क्षण राग, द्वेष, ऊंच, नीच, हिंसा, जातिवाद, सम्प्रदायिकता के लिए है ही नहीं। यदि आप किसी भी ऐसी चीज़ पर अपना समय नष्ट कर रहे है तो आप अपने उत्सवों के क्षणों को नष्ट कर रहे हैं। ऐसा ना करें।
सही धर्म सिर्फ वही है जो आपको दूसरों के जीवन को अत्यधिक आनंद और प्रगति देने के लिए प्रेरित करता है। वह नहीं जो दूसरों से बैर सिखाता है।
भारतीय समाज समय के साथ साथ कुछ विदेशी गंदगी और कुछ स्वयम की पैदा की हुई कुरीतियों की चपेट में आ गया है। इसे सही करने की ज़िम्मेदारी हमारी है ताकि हम आने वाली नस्लों को उत्सव और प्रगति पूर्ण जीवन जीने में सहायता कर सकें। दुनिया का क्या है ये तो लड़ती मरती आई है। हम भारतीयों के संस्कार समर्पण और त्याग से परिपूर्ण है।
उत्सव और प्रगति ही हमारा जीवन दर्शन है।
एम नदीम
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