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Showing posts from March, 2020

जब लड़ाई पर निबंध लिखने को कहा गया

में इस बात का घोर समर्थक हूँ कि भारत को किसी प्रकार के अनुसंधान की कोई आवश्यकता नही। यहां सब कुछ है। जितनी ज़रूरत थी उतना कर लिया गया था। गोबर के उपलों के अलावा भारत की एक मात्र खोज चारपाई है। मनोरंजन के रोज़मर्रा के उपलब्ध साधनों में एक है लड़ाई।  उत्तर प्रदेश में मोहल्लों की लड़ाइयां पूरे मुहल्ले के लिए अति रुचि का विषय होता है उनके दो पार्टियों को छोड़कर जो लड़ रहे होते है।  इन लड़ाइयों का केंद्र बिंदु नालियां होती है या परचून की दुकान पर बकवास झाड़ते हुए एक को दूसरे की बात बुरी लग जाना। हिन्दू उच्च जातीय वर्ग चूंकि रहने के मामले में सभ्य है इसलिए ये मनोरंजक अवसर उनके बच्चों के नसीब में नहीं आ पाते। इस मामले में हिन्दू निम्न जातियाँ भी किसी हद तक रहना सहना सीख चुकी है। इसलिए भारत मे ये सांस्कृतिक धरोहर सिर्फ मुसलमानों ने सहेज कर रख रखी है गली मोहल्लों की लड़ाइयां एक सतत प्रक्रिया है जो किसी ना किसी जगह चलती ही रहती है। इन लड़ाइयों में गाली गलौच और मार पिटाई से भीड़ का मनोरंजन किया जाता है।  इनके निम्न कारण होते है। 

रोटी की चोरी एक जघन्य अपराध है

रोटी की चोरी एक जघन्य अपराध है चोरी एक जघन्य अपराध इसे कहते हैं न्याय संदिग्ध एक 15 वर्षीय मैक्सिकन जन्मा लड़का था। एक दुकान से चोरी करते पकड़ा गया। पकड़े जाने पर गार्ड की पकड़ से भागने की कोशिश की। यहां तक कि प्रतिरोध के दौरान दुकान का एक शेल्फ भी टूट गया था। जज ने अपराध सुना और लड़के से पूछा ” तुमने वास्तव में कुछ चुरा लिया?” “रोटी और पनीर पैकेट” लड़का स्वीकार करता है। ” क्यों?” “मुझे चाहिए” लड़के ने छोटा जवाब दिया। “ख़रीद लेते” “पैसा नहीं था” “परिवार से ले लेते” ” घर पर केवल माँ है। बीमार और बेरोज़गार। रोटी और पनीर उसके लिए चुराई थी” ” आप कुछ भी नहीं करते हैं?” ” एक कार वाश करता था। माँ की देखभाल के लिए एक दिन छुट्टी की तो निकाल दिया” “आपने किसी से मदद मांगी होगी” ” सुबह से मांग रहा था। किसी ने मदद नहीं की” सुनवाई ख़त्म हुई और जज फैसला सुनाया: चोरी और विशेष रूप से रोटी की चोरी एक जघन्य अपराध है। और इस अपराध के लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। अदालत में हर कोई, मेरे सहित इस चोरी का दोषी है। मैं यहाँ मौजूद हर शख्स पर और अपने आप पर 10 डॉलर का जुर्माना चार्ज करता हूँ। दस डॉलर का भुगतान किए बिन...

भारत मे नए शुद्र आने वाले है

भारत मे जाति का इतिहास पुराना है। यहाँ की जाति व्यवस्था का इतिहास उससे भी पुराना है जितना खुद भारत का इतिहास। जाति व्यवस्था के आरम्भ से अस्तित्व तक पंहुचने का विषय जटिल तो है ही, इतने पुराने ऐतिहासिक स्त्रोतों का ना होना उसे लगभग असंभव बना देता है। अंग्रेजों का भारत मे आना इस व्यवस्था पर चोट थी और हज़ारों साल से दबे कुचले लोगों के लिए स्वतंत्र नायक थे अंग्रेज। अंग्रेजो के आने का नतीजा ये हुआ कि अब ये व्यवस्था मजबूरी में ही सही मगर दिमागों तक सीमित है और आम धरातल पर दम तोड़ रही है। वजह है जिनको शुद्र कहा जाता था अब वो जाग गए। अब वो अफसर भी है, राजनीतिज्ञ भी और कारोबारी भी। अब भविष्य में तो इन लोगों को दोबारा शुद्र बनाना लगभग असंभव है। मगर एक दूसरा सम्प्रदाय है जो शुद्र बनने को आतुर है उस दौर में जब उसे कोई शुद्र नही बनाना चाहता। इस देश मे मुसलमान जिस तरह की आत्मघाती ज़िन्दगी गुज़ार रहा है इसमे कोई संदेह नही कि ये शुद्र हो गया है। पहले शुद्र किस तरह बने ये पता नही मगर इस बार के शुद्र यानी मुसलमान स्वेच्छा से शुद्र बन रहे है। जीवन यानी समय और बुद्धि को जिस तरह मुसलमान क़ौम अपने पैरों तले रौंदत...

कुत्ता

बचपन मे सुनी हुई एक रिवायत ज़हन से गुजरी जिसमे एक सहाबी (ग़ालिबन हज़रत अब्दुर्रहमान बिन ऑफ रज़ियल्लाहु अन्हु) का ज़िक्र था। रावी लिखता है कि उसने अब्दुर्रहमान को सफर के दौरान खाना खाते हुए देखा। पास में उनका कुत्ता बैठा हुआ था। खाने का अच्छा और ज़्यादातर हिस्सा आपन कुत्ते को खिला रहे थे। रावी ने इस अमल का सबब पूछा तो आपने रज़ियल्लाहु अन्हु ने जवाब दिया कि अल्लाह की मख़लूक़ मुझे उम्मीदों से देख रही हो और में बेहतरीन हिस्सा खुद कहा जाऊ। ऐसा कैसे हो सकता है? सिलसिलेवार मुझे उम्र का दजला नहर के पास खड़े कुत्ते से मिसाल देकर समझाना याद आता है। फिर असहाब ए कहफ़ का कुत्ता, याहया अलैस्सलाम का कुत्ता। पता नही कौन सी दुनिया मे खो गया में। घर से निकला तो फिर सड़क से सफेद रंग का कुत्ता आकर पास खड़े हो गया और छूने की कोशिश करने लगा। में उस मासूम के बदन पर अपने आस पड़ोस के लोगों के मारे हुए ज़ख्म देख रहा था और मजबूर था कि उसको एक टुकड़ा खिला सकूं। मुझे उसे कुछ भी खिलाने के लिए अपने घर से दूर ले जाना पड़ता है ताकि कोई देख ना ले। क्योंकि कुत्तों को खाना खिलाना भी उन मेरे आस पास के लोगो के लिए मुझसे लड़ने का एक बहाना बन...