तुम खुद को समझते क्या हो ? क्या तुम्हें हिसाब किताब के लिए बनाया गया है या हिसाब किताब को तुम्हारे लिए। तुम कोई भी घटना घटित ही नहीं होने दे रहे। तुम्हारा दिमाग में कुछ भी होने से पहले इतना हिसाब किताब जोड़ लेने की बीमारी पैदा हो गयी है कि तुम एक गिलास पानी पीने के से पहले भी पूरे ब्रह्मांड गणित हल कर लेते हो। तुम्हारे दिमाग़ में ये सवाल आ ही चुका होगा मुन्नालाल कि हिसाब किताब में बुराई ही क्या है। आचार्य जी बिना वजह ही मेरी इतनी बड़ी योग्यता के पीछे पड़ गए। इसमे क्या बुराई है कि में हर चीज़ को होने से पहले हिसाब किताब लगाता हूँ? भला अंतरिक्ष मे रॉकेट बिना हिसाब किताब के नही भेज सकते तो में एक गिलास पानी का हिसाब क्यों ना लगाऊँ। और तुम होते भी कौन हो आचार्य जी जो मेरे हिसाब किताब के बीच मे आओ। भला हिसाब किताब लगाना किसी बुद्धिजीवी से कम स्तर की बात है क्या ?
अच्छा तो मुन्नालाल फिर कितनी बार तुम्हारे हिसाब किताब का उत्तर पॉजिटिव आया है। तुम्हारे इस हिसाब किताब का हल ना कभी पॉजिटिव आया था ना आएगा। क्योंकि ये रॉकेट लॉन्च नही तुम्हारी ज़िन्दगी लॉन्च होने की घटना से जुड़ा हिसाब किताब है। तुम अगर विद्यार्थी हो तो बताओ सिर्फ पढ़ाई के लिए कब पढ़े थे। जवाब यही है ना कि सिर्फ नम्बरो के लिए पढ़ा। तो बताओ फिर पढ़ाई से तुम्हे आनन्द आये तो आये कैसे? किसी की ज़रूरत में तुम काम आए तो तुम्हारे ज़हन में ये सवाल खुद ब खुद क्यों उठ जाता है कि इससे मुझे वापस क्या मिलेगा। अगर तुम्हें ये भी लगे कि इससे ज़रूरतमंद से कुछ नही मिलने वाला तो तुम यही हिसाब किताब भगवान से करने लगते हो कि इस पुण्य के बदले भगवान मुझे क्या देगा। यहां तक कि तुम स्वर्ग की कल्पनाएं भी करने लगते हो। तुम यहाँ भी नीच के नीच रहे। तुमने अपने हिसाब किताब में ज़िन्दगी को जहन्नुम बना लिया।
तुम्हे इस बात का पता ही नही की ज़िंदगी का हिसाब नही लगता। हर घटना अपने साथ परिणाम लेकर आएगी ही इसमे कोई शक़ नही मगर ये भी निश्चित है कि परिणाम तुम्हारी कल्पनाओ से हमेशा अलग होगा। तुमने जितना उत्कृष्ट सोचा होगा उससे भी ज़्यादा उत्कृष्ट। मगर इसकी उत्कृष्ठता हमेशा तुम्हारे हिसाब किताब के हाथों मारी जाती है। सच तो ये है की इस हिसाब किताब ने तुम्हे निष्क्रिय कर दिया। जीवन तुम्हारे दिए हर समर्पण को तुम्हारी कल्पनाओ से बढ़कर तुम्हे लौटाएगा। तुम बस हिम्मत करो जो ईश्वर तुम्हे मौके देता है उन मौक़ो को पूरा पूरा जीने की। कभी ठंडी हवा में आज़ादी की सांस लो फिर कोई ऐसा काम करो जो अर्थपूर्ण लगे और उसे कर के भूल जाओ। यही प्रक्रिया दोहराओ। दोहराते ही जाओ। ज़िन्दगी इतना देगी कि वैराग्य को भूल ही जाओगे। ना कोई डर रहेगा ना मायूसी। सिर्फ जीवन ही जीवन राह जाएगा। जिंदगी को रॉकेट बनाने से बचा लो मुन्नालाल। राकेट की किस्मत में दो ही चीज़े है। या प्रयोग होते होते ही फट जाएगा या अंधेरे में खो जाएगा। जीवन जियोगे तो जीवन उजाले में चमक उठोगे। मुस्कुराहट तुम्हारा परमानेंट गहना बन जायेगा।
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