धर्म का प्रयोग देह की तृप्ति के लिये होना कोई नई बात नहीं। कोई ना कोई या तो इस पागल पन में सम्मिलित है या इससे प्रताड़ित है। लगभग सभी सम्प्रदाय इस प्रयोग में सफल हो चुके हैं। ईसाइयो ने बाईबल को पूर्णतः त्यागकर प्रोटस्टेंट की आड़ में ईसाइयत से पूरी तरह निकलकर भौतिकवादी सामाजिक संरचना का अविष्कार कर उसको जीवन प्रणाली बना ही लिया। अब एक ठोस प्रेरणा स्त्रोत के के रूप में डॉलर आधारित व्यवस्था है। गगनचुंबी इमारतों से भरे महानगर। वो बेंचने के लिए आतुर एक ऐसी चमक धमक भारी व्यवस्था का निर्माण कर चुके जिसमें शिक्षा, स्वास्थ, सैन्य उपकरण, सेनाएं, तकनीकी, संचार, पानी, खाना यहां तक कि जीवन और मृत्यु सब कुछ व्यवसाय के रूप में बिक रहा है। धर्म को पूर्णतः त्यागकर जिस पथ पर पूरी ईसाई दुनिया चल रही है उसमें फिर भी दबी कुचली मानवता के लिये कहीं कोई रास्ता निकल जाता है भले ही उसके बदले दुनिया के किसी एक या एक से अधिक हिस्सों को युद्ध क्षेत्र बनकर इस चमक धमक चुकानी पडती हो। अगर गैर ईसाई इलाक़ों में ना सही तो वो अपबे ही किसी ईसाई टुकड़े पर (जैसे यूक्रेन) बम बरसाकर ही अपनी गगनचुंबी इमारतों की भव्यता को यथावत बनाये रखने में कोई प्रयन्त नही छोड़ते।
हिदू समाज तो इतना प्रौढ़ हो चुका है कि उसने धर्म को ही जातिवादी व्यवस्था का एक अवयव मात्र बना डाला। भारतीय उपमहाद्वीप में बसने वाला अरब, तुर्की, भी इसी व्यवस्था का ही एक हिस्सा भर है। चाहे हिंदुस्तानी मुसलमान हो या ईसाई या पारसी या यहूदी धरती पर एक करोड़ सजदे कर ले, अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी भाषा मे अपने घर में अब्राहिमन धर्म की किताबो का चट्टा लगा दे या मक्का मदीना, वेटिकन, येरुशलम की चित्रावली से घर के कक्षों को भर दे। भारतीयता को ही जीता है भारतीय संस्कृति से एक पल भी भाग नहीं सकता। मस्जिद, चर्च, सिनेगॉग के नामकरण तक मे वही जाति आधारित। कितनी ही अरबी पढें, फ़ारसी पढें या अंग्रेज बन जाये अपने धार्मिक पुस्तकों की व्याख्या चाहिए हिंदी में ही। अपना पन अनुभव करने के लिए अंततः मुंशी प्रेमचंद की कहानियां पढ़ेगा और बातो बातो में मिसाल देगा तो सिया राम की देगा।
एक आयत याद ना हो मगर आत्मा अमर वाला श्लोक सब को याद रहता है।
भारतीयता कोई धर्म नहीं एक जीवन शैली है जो इतनी प्रौढ़ और सशक्त है कि इस महाद्वीप में रहने वाला कोई व्यक्ति इसके सामने एक कमजोर अरबी फ़ारसी अंग्रेजी प्रभाव को एक क्षण भी नही जी सकता।
यह लेख को भारतीय मुसलमानों की मानसिक व्यथा से अवगत कराने की दृष्टि से लिखा गया है।
भारतीय मुसलमान एक ऐसी विचारधारा से अपने आप को जोड़ता है जिसके बारे में उसका ज्ञान शून्य के आस पास नही पुर्णतः शून्य है। क़ुरान और मुहम्मद को समझना आम मुसलमान के तो दूर की बात बौद्धिक वर्ग के लिए भी लगभग असंभव है। इसका मुख्य कारण है कि भारतीय मुसलमानों के साथ साथ दुनियां में व्यक्तियों का कोई ऐसा समूह नही जो क़ुरान से अवगत होने का दावा कर सकता हो।
तो फिर अगर मुसलमानों के पास इस्लाम का एकमात्र स्त्रोत यानी क़ुरान ही नहीं तो फिर इस्लाम के नाम पर है क्या ? क्या है जिसको इस्लाम कहा जाता है ?
वास्तविकता यह है कि मानवता के क्षेत्र में आगे बढ़ने के बाद जिस स्थान पर जाकर किसी मस्तिष्क और आत्मा की सम्पूर्ण जिज्ञासाएं और पर्यटन टेक देते हैं वहाँ से आगे चलने के पथ का नाम क़ुरान है। इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन की किसी आयु को पंहुचकर अंतिम निर्णय कर ले कि उसको बचा हुआ सारा जीवन मानवता के लिए और ईश्वर के चरणों मे अर्पित करना है तो किसी ऐसे विरले व्यक्ति को ही क़ुरान समझ आ सकता है। जिस व्यक्ति को क़ुरान में कोई धर्मग्रन्थ या कर्मकांड ढूंढने है वो उसे मिलेगा ही नहीं। क्योंकि क़ुरान में ऐसा कुछ है ही नहीं। क़ुरान खाली है रीति संस्कृति धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं से। इसमें नमाज़ तक को खुलकर नही बताया गया तो और कल्पनाएं तो छोड़ ही दीजिये।
मुसलमानों के पास जो है वो क़ुरान के पैगम्बर मुहम्मद पर अवतरित होने से पहले ईरानी, अरबी, तुर्की बुद्धिजीवियों के अपबे धर्म के प्रभाव है जो उन्होंने इस्लाम के नाम पर दुनिया को बताए। क़ुरान रहित जिस धर्म को मुसलमानों ने अपने सिर पर सवार कर रखा है उसकी कटु परन्तु वास्तविकता यही है कि वो ईरानियों, तुर्कों अरबों के वो धर्म अंश हैं जो अरब साम्राज्यवाद के बाद मुसलमान धर्म परिवर्तन के बाद इस्लाम के नाम पर घड़े गए। ईरानी अपने ज़ूरतुष्ट, यहूदी अपने हैकल, इसे अपने ट्रिनिटी, तुर्की अपने सूफीवाद को लाये और मिलाजुलाकर एक मिश्रण तैयार किया जिसे इस्लाम कहा जाता है। स्मरण करने योग्य ये बात है कि ये पूरा पैकेज क़ुरान रही है जो पैगम्बर मुहम्मद की एक मात्र पुस्तक है जो उन पर ईश्वर की और से अवतरित की गई। मगर इन ईरानी तुरानिय ने एक कमाल का षड्यंत्र रचा। मुसलमान क़ुरान को दिन रात पढ़ते है। मस्जिदों में पांच बार नमाज़ों में सुनते हैं। अगर आप मस्जिद से नमाज़ पढ़कर निकल रहे किसी व्यक्ति से पूछें कि आपने इस नमाज़ में क्या ईशवाणी सुनी और उसका क्या अभिप्राय था तो वो सिर्फ सिर खुजा कर निकल सकता है। इससे आगे बढ़कर आप 50 साल से नमाज़ पढ़ा रहे मौलवी साब से पूछेंगे तो उनको भी कुछ अता पता नहीं होगा। अगर कोई भूला भटका मुसलमान क़ुरान का अनुवाद पढ़े भी तो वो अनुवाद इतने ईरानी प्रभावों से ग्रसित होता है कि उसमें अरबी का अनुवाद कम और ईरानी प्रभाव बहुत अधिक भरा होता है।
यही वजह है कि जो मुसलमान कोई तुर्की धारावाहिक इंटरनरेट से देख लेते हैं तो उसे ही इस्लाम समझने लगते हैं। कोई ईरानियों की कहानियां सुन लेता है तो शियावाद को इस्लाम समझने लगता है। सऊदी अरब हो आता है तो अब्दुल्ला इब्ने वहाब के धर्म को इस्लाम समझने लगता है या फिर तुर्की सूफीवाद को इस्लाम समझने की भूल करने लगता है।
जिन लोगों ने क़ुरान को समझने में एक जीवन दे दिया सिर्फ वही जानते है कि मुहम्मद इंसानियत के सबसे ऊंचे स्थान पर खड़े हैं जहां सिर्फ मानवता के रास्ते पर चलकर ही पंहुच जा सकता है धर्म के नहीं। बाद के इंसानों के पास मुहम्मद और उसके ईश्वर तक पंहुचने का एक ही रास्ता है वो है कि वो पूरी दुनियां के इंसानों को अपना परिवार समझें जैसे मुहम्मद ने समझा और क़ुरान को समझें। इसे धर्म समझने की भूल करने वाला कभी मुहम्मद तक नहीं पंहुच सकता।
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