बचपन मे सुनी हुई एक रिवायत ज़हन से गुजरी जिसमे एक सहाबी (ग़ालिबन हज़रत अब्दुर्रहमान बिन ऑफ रज़ियल्लाहु अन्हु) का ज़िक्र था। रावी लिखता है कि उसने अब्दुर्रहमान को सफर के दौरान खाना खाते हुए देखा। पास में उनका कुत्ता बैठा हुआ था। खाने का अच्छा और ज़्यादातर हिस्सा आपन कुत्ते को खिला रहे थे। रावी ने इस अमल का सबब पूछा तो आपने रज़ियल्लाहु अन्हु ने जवाब दिया कि अल्लाह की मख़लूक़ मुझे उम्मीदों से देख रही हो और में बेहतरीन हिस्सा खुद कहा जाऊ। ऐसा कैसे हो सकता है?
सिलसिलेवार मुझे उम्र का दजला नहर के पास खड़े कुत्ते से मिसाल देकर समझाना याद आता है। फिर असहाब ए कहफ़ का कुत्ता, याहया अलैस्सलाम का कुत्ता। पता नही कौन सी दुनिया मे खो गया में। घर से निकला तो फिर सड़क से सफेद रंग का कुत्ता आकर पास खड़े हो गया और छूने की कोशिश करने लगा। में उस मासूम के बदन पर अपने आस पड़ोस के लोगों के मारे हुए ज़ख्म देख रहा था और मजबूर था कि उसको एक टुकड़ा खिला सकूं। मुझे उसे कुछ भी खिलाने के लिए अपने घर से दूर ले जाना पड़ता है ताकि कोई देख ना ले। क्योंकि कुत्तों को खाना खिलाना भी उन मेरे आस पास के लोगो के लिए मुझसे लड़ने का एक बहाना बन सकता है।
कुत्ता हमारे समाज मे एक गाली है। कुत्तो के पीछे दौड़कर, उन्हें लहूलुहान करते करते एक क़ौम का बचपन जवान होता है। उसे नापाक समझा जाता है। हिक़ारत से देखा जाता है। मसले मसाइल में तो यहां तक लिखा है कि जिस घर में कुत्ता रहे वहां से बरक़त उठ जाती है। मैंने अब तक सिर्फ एक आदमी को पाया है जो दीनदार भी है और कुत्ता भी पालता है। आप जब भी लानती क़ौम के मुहल्लों से गुजरे तो कुत्तो को ध्यान से देखना। फिर उसके बदन पर सूखे पुराने और नए ज़ख्म देखना।
मुहज़्ज़ब दुनिया घरो में कुत्ते पालती है और उनके यहाँ रिज़्क़ की कमी नही होती। लानती क़ौम के अक़ीदे में कुत्ते से बरक़त छीन ली जाती है और इनकी हालत सबको मालूम है। मुहज़्ज़ब दुनिया का मामला कुत्तो के साथ सहाबा वाला है और लानती मुशरिक़ क़ौम का उसके उलट।
कुत्ता क़ुरान से लेकर रिवायतों में भी इस्लाम के असल लिटरेचर का हिस्सा है। और लानती क़ौम को ठहरी इस्लाम से नफरत। इसलिए इस्लाम में जिस जानवर को इतनी एहमियत दी गयी हो इसी को ज़ख़्मी करके अपना दिल ठंडा कर लेते है।
लानती क़ौम को वफादारी से भी नफरत है इसलिए भी शायद ....
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