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मुँह के बीड़ी जलाता हुआ हाजी लल्लू ठेकेदार अपने गंजे सिर पर हाथ फेरता चला आ रहा था। प्रोफेसर मित्तल को देखकर रुक गया, फिर मूछें मोड़ते हुए बोला, " और प्रोफेसर साब क्या हाल हैं ??"। प्रोफेसर मित्तल ने जवाब दिया," ठीक है भाई तुम बताओ कैसे हो? कहाँ से आ रहे हो?"। तभी दिल्लू (दिलनवाज़ ठेकेदार, सट्टे का अड्डा चलाने वाला) भी हाजी लल्लू को देखकर रुक गया और दोस्ताना अंदाज़ में बड़े खुशमिजाजी से लल्लू से हाल चाल पूछने लगा,"और बे भो..... के कहाँ ........रहा है आजकल।" इसी प्यार के लहजे में लल्लू और दिल्लू की बातें आगे बढ़ती चली गयी। प्रोफेसर मित्तल वहीं खड़े रहे और फिर वहां से निकलने के लिए मुड़े और चल दिये। मुड़ते मुड़ते उनके कान में लल्लू ठेकेदार की एक बात सुनाई पड़ी। "अबे मिझे तो अमेरिका की सरकार चिपटरी नागरिकता देने कु, पर भाई अपना घर ना छोड़ा जावे, मेरे सट्टे के काम की तरक़्क़ी देखकर हारवर्ड यूनिवर्सिटी अवार्ड देवे"। मित्तल जी के कान खड़े हो गए। और चोंक उठे। "अमेरिका की सरकार ????" प्रोफेसर मित्तल को इस बात का अचम्भा नही था कि लल्लू ने इतनी बड़ी ढींग क्यों हाँकि क्योंकि उनकव मालूम है कि ये लोग ऐसे ही ढींगें हांकते है। बल्कि उनको अचम्भा इस बात का था कि इसने ढींग मारने में हारवर्ड यूनिवर्सिटी का नाम लिया। यानी इतनी बड़ी जगह से लल्लू द्वारा खुद को जोड़ना सारी हदों को पार करना था।

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