यूं तो दुनियां अलग अलग किस्मों केआदमियों से भरी हुई है। इसलिए यहाँ तबके पाये जाते है। इस तबके के कुछ रोचक और वास्तविक पहलू इस तरह हैं।
1. इनकी ज़िंदगी मे सबसे बड़ा धर्म काम करना है और सबसे बड़ा गुनाह काम ना करना।
2. इनको काम करने के बाद अपने काम के बदले मिलने वाले रुपयों का इंतजार करना। रुपये मिलने पर खुशी की लहर दौड़ जाना और ना मिलने पर मायूसी और ज़्यादा शिद्दत से रुपयों का इंतजार करना ।
3.इनको फ़लसफ़े ज़्यादा छू नही पाते और ना ये लोग बहुत ज़्यादा गहराई से सोच सकते है क्योंकि इनको अपना काम पूरे ध्यान से करना होता है।
4. इनको विरासत में सिर्फ सर ढकने को छत और मामूली रुपये मिल जाते है या कभी कभी वो भी नहीं।
5. इनको जल्दी से रुपये और इज़्ज़त कमाने की लालसा तो होती है मगर मेहनत करके कमाने की इतनी ज़्यादा आदत पड़ चुकी होती है कि अगर कही कोई शार्ट कट मिल भी जाये तो शक की निगाह से देखते हैं। अगर कहीं लालच में आकर कुछ रुपया कही इन्वेस्ट भी कर देते हैं तो वो अक्सर डूब ही जाता है।
6. पूरी ज़िंदगी इस आस में गुज़ार देते हैं कि हमारी औलाद को हमारी तरह मेहनत ना करनी पड़ जाए मगर साथ साथ बचपन से अपने बच्चों को मेहनत करने की आदत डाल ही देते हैं।
7. इनकी औलादों को विरासत में ना तो महल मिलते है ना खज़ाना अय्याशी करने के लिए। विरासत में मिलती है तो मेहनत जो पीढ़ी दर पीढ़ी बाप से बेटे या बेटी में ट्रांसफर होती रहती है। कहानी फिर दोहराई जाती है। अगर कोई थोड़ी ज़्यादा मेहनत करके कुछ कमाकर अपनी औलाद को कुछ ज़्यादा दे भी दे तो औलाद को मेहनत पर लौटने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता।
8. बदलते ज़माने के साथ साथ इतना ही फ़र्क़ आ पाता है कि अगली पीढ़ी कुछ ज़्यादा अच्छे मकानों में रहने लगती है और साइकिल से बाइक और बाइक से गाड़ी की तरफ तरक़्क़ी करने लगती है। हालांकि इन सब की बुनियाद भी सिर्फ मेहनत पर ही टिकी होती है।
9. साल में चार करीबी शादियां और आठ दूर की शादी ही मुख्य एंजॉय मेन्ट साधन उपलब्ध है। कभी कभार किसी दूर के सफर पर हो आना। हर एन्जॉय के अवसर की उपयोगिता खर्च करने की क्षमता पर निर्भर करती है। 10. इनकी आपसी बातचीत में थोड़ी सी पॉलिटिक्स, थोड़ी सी समाजियात, थोड़ी सी धार्मिकता और ज़्यादातर व्यवसाय से जुड़ी बातें ही जगह बनाती हैं। बहुत गहरे फ़लसफ़े इन्हें समझ ही नही आते जिनसे कोई उपद्रव होने की गुंजाइश ही पैदा नहीं हो पाती।
11. इनके अस्थाई झगड़े तो और भी कमाल के होते है जो थोड़े बहुत रूठने मनाने के साथ ही खत्म भी हो जाते हैं।
12. पैसे से पैसा बनाने वाले चालाक और मक्कार लोगों को अपने पास आते देख ये सहम जाते हैं डर जाते है। उनको इज़्ज़त देने और खातिर दारी करने में कोई कमी नहीं छोड़ते। भला उस ऊंचे तबके की शान में गुस्ताखी कैसे कर दें जो इन्ही की गाढ़ी कमाई को लूटकर ऊंचे मक़ाम पर पंहुचा हो।
13. महान कार्ल मार्क्स के उरूज से पहले तो इन मेहनतकशों को ये भी मालूम ना था कि वो इंसान भी है। काम काम बस काम। उस शख्श यानी कार्ल मार्क्स को ये लोग जानते भी नहीं जिसकी जद्दोजहद ने इनको इनकी मेहनत के बदले रुपया लेना सिखाया था।
14. इनमें से लोग धार्मिक तो बन जाते हैं लेकिन मधाधीश यानी धर्म को व्यवसायीकरण इन पर नहीं हो पाता।
15. समाज के चोर जो बिना मेहनत आराम और ऐश की ज़िंदगी जीते हैं वो सारा माल इन्ही से चुराते हैं। पूंजीवादी भी इन्ही की मेहनत को चुराकर मजे लूटते हैं।
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