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कोई टाइटल नहीं बस हिम्मत चाहिए पढ़ने को

उस बस्ती में एक पागल था या सारा गाँव का गाँव पागल था  ? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए मैन कुछ दिन तक गाँव के चक्कर लगाए। उस गाँव मे मेरे कुछ परिचित भी थे जिनसे बहुत अच्छे संबंध होने की वजह से मेरे रोज़ाना आने जाने का संकोच भी आड़े नहीं आ पाया। 

गाँव के अंदर मेरा आकर्षण मात्र एक ही व्यक्ति था। वो जिसे राजू कहकर पुकारा या चिढ़ाया जाता था। में उसको गांव के अलग अलग तिरस्कृत जगहों पर बैठा देखता था या फिर हाथ में पत्थर लिए लड़कों को मारते। एक तरफ लड़कों का झुंड, वो उसे कुछ अपशब्द कहते, ठहाके लगाते, फिर वो उनके पीछे पत्थर लेकर भागता, वो तितर बितर हो जाते फिर। फिर वो पत्थर फेंक कर अपना सिर खुजाता अपने जिस्म के किसी भाग को खुरचता और चला जाता। लोगों ने बताया कि छेड़ने का ये द्रश्य दिन में चार पाँच बार नित प्रतिदिन होता रहता है। 
गाव के हर वर्ग के जवान हो या बच्चे पत्थर लगने के संकट के बावजूद उसको छेड़ने का रस लेने से नहीं चूकते। जहाँ कही भी सार्वजनिक जगह पर तथाकथित इज़्ज़तदार लोग बैठकर चाय पीते या अखबार पढ़ते या गुफ़्तुगू करते थे उसे वहाँ से भगा दिया जाता था। 
वो किसी के घर के बाहर खड़ा हो जाता या किसी चबूतरे पर बैठ जाता तो वहाँ से भगाने के लिए उसके ऊपर पानी डाल दिया जाता था चाहे कितनी भी कड़ाके की ठंड हो या गर्मी।
धार्मिक स्थल जो ईश्वर का घर कहा जाता है उसे वहाँ जाने की अनुमति भी नहीं थी।
मैंने उसके वर्तमान जीवन के हर भाग को समझने के बाद उसके परिवार से मिलने का निश्चय किया। मालूम हुआ कि उसके माता पिता भी हैं बहन भाई भी सभी विवाहित जीवन जीते हैं। घर पर भी उसका प्रवेश निषेध है। जैसा पूरे गाँव का व्यवहार है उसके परिवार जनों का भी लगभग बस वो उसे गाली देकर छेड़ते नहीं। उसे अपने ऊपर भगवान का अभिशाप मानते हैं। या पिछले कर्मों का कोई दण्ड जो ऐसा शापित उनके घर पैदा हुआ।
बस एक माँ थी जो उसे घर का बचा खुचा खाना दे देती। लोगों की मिन्नतें करती की उसे रोटी पकड़ा आये। निश्चित ठिकाना ना होने की वजह से उसका खाने पीने का समय भी निश्चित नहीं था। बस वो ज़िंदा था।
मैने एक गाँव के परिचित से उसकी माँ को मिलने का आग्रह करवाया। माँ ने रूखे व्यवहार से मिलने का कारण पूछा तो मैने सिर्फ मिलने तक को कहा। आगे की बात मैं मिलकर ही करूँगा।
उन्होंने मुझे एक धार्मिक स्थल पर मिलने को कहा।

माँ से हाल पूछना सिर्फ एक औपचारिकता भर थी। 55 साल की उम्र में उसका हाल 80 साल जैसा। चेहरे पर गम के असीम गहरे नक्श। जैसे अब रोना भी न आता हो। मैने उससे बेटे के बारे में पूछा। ह्रदय का समुंदर उभार लेकर आंखों से रो रो कर बरसने लगा। में उसे सम्भाल भी नहीं सकता था। सब कुछ जानता था। वो ओढ़नी से मुँह आंख पोछती फिर रोती। बहुत देर बाद रोते बिलखते बोली।
"वो पागल नहीं था थोड़ा मन्दबुद्धि था, वैध डॉक्टरों ने कहा था उम्र के साथ साथ ठीक हो जाएगा। जैसे जैसे बड़ा होता गया लोगों ने उसे पागल कहना शुरू कर दिया। मास्टरों ने मारना शुरू कर दिया। स्कूल में उसके तोतलापन साथ के बच्चों के लिए खेल बन गया। स्कूल से निकाल दिया। गली मुहल्लों के बच्चे उसका मज़ाक़ उड़ाते। बड़े उसे पागल कहते।"
 उसका रोना उसे बोलने भी नहीं दे रहा था फिर भी हिम्मत करके बोली
"चलते चलते उसका पजामा निकाल देते कभी मारते मारते खून निकाल देते। हुजूम का हुजूम पागलों की तरह उसके पीछे चिल्लाता उसे दौड़ाता।"
 फिर रोते रोते गुस्से में आ गयी बोली
"क्या बिगाड़ा था मेरे बच्चे ने इन गाँव वालों का, किसी से क्या मांगता था वो, ईश्वर की सौगंध वो पागल नहीं था उम्र के हिसाब से धीमा था, इन लोगों ने, इन गांव वालों ने उसे पागल कर दिया"
मैंने पूछा कब से घर से बाहर रहने लगा
बोली
"दस साल का था जब रोता हुआ आया कुरते में पीछे खून लगा था। बाप को पता लगा गाव के चार अधेड़ों ने.........बाप ने बदला लेने के बजाय उसी को मारा और आज तक ...... आज वो पच्चीस साल को होता ब्याह हो गया होता ...इन गाँव वालों ने मेरा बच्चा जीते जी मार दिया। मरने से परे कर दिया।"
 
उस महिला के रोने में इतना दर्द था कि मैने मुझे बात चीत वहीं रोकनी पड़ी। सच तो ये है कि मैं खुद को असहज महसूस कर था। मेरा ह्रदय फटने लगा था। 

मैने उस माँ से जाने के लिए कहा और वादा किया कि उसके बेटे के लिए जो सम्भव हो सकेगा करूँगा।

इस पूरी घटना से सबसे ठोस सत्य जो मेरे सामने निकल कर आया वो ये था कि उस गाँव का हर हर व्यक्ति पागल था। पागल अगर नहीं थी वो माँ और उसका मासूम बेटा। 

शायद ही इस देश इस उपमहाद्वीप का कोई गाँव और बस्ती हो जहां ऐसे जहां आपको समाज के सताए हुए लोग ना मिल जाये। हो सकता है कि कोई ऐसा राक्षस भी इस लेख को पढ़ रहा हो जिसने ऐसे किसी मासूम को ज़िन्दगी में कभी ना कभी सताया होगा। हम लोग उस सामाजिक परिवेश से आते हैं जहाँ इंसान की कमज़ोरी पर उसके लिए करुणा, तरस और सहयोग के बजाए उसकी कमज़ोरी का मज़ाक़ उड़ाया जाता है उस पर जुल्म किया जाता है। असल औक़ात यही है इस नपुंसक संमाज की। इनसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है। 

वो जिन्हें "पागल" कहा जाता है। वो भी किसी के दिल का टुकड़ा है जैसे हमारे आपके औलाद होती है। जब भी किसी बस्ती या गांव में कोई ऐसा मिले तो एक बात निश्चित जान लीजिए कि
"उस गांव में उसे और उसकी माँ को छोड़ कर बाकी सब पागल हैं"


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