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भारतीय जीवन शैली में क्या है विशेष ?

जी हाँ मेने सभी धार्मिक प्रतीकों की अनदेखी की है उस समय जब में ये लेख लिख रहा हूँ। क्योंकि इस विषय पर लिखने वाले और पढ़ने वाले को सबसे पहले धर्म हटाना होगा अन्यथा यहाँ कुछ हाथ लगने वाला नहीं। ये बहस तुम्हारे मस्तिष्क में उपजाए गए ईश्वर की परिकल्पनाओं से परे है। यदि तुम उनमें से हो जिनके मस्तिष्क में ईश्वय  शिशु होने से वयस्क होने की अवधि में परिजनों और समाज द्वारा घड़ दिए जाते है तो तुम्हे इस लेख में कुछ प्राप्त नहीं होने वाला। ईश्वर मस्तिष्क में घड़ कर ह्रदय में निवास नहीं कराए जाते। ईश्वर का अनुभव तो ह्र्दय में उत्पन्न होकर सृष्टि में फैलता है। यदि तुम्हें ईश्वर का अनुभव ह्रदय में हुआ तो आगे पढ़ना वरना मस्तिष्क में उत्पन्न ईश्वरीय कल्पनाओं वाले किसी व्यक्ति के लिए मंदिर, मठ, गिरिजा, मस्जिद, मदरसे खुले हैं, वहाँ जाकर अपना मस्तिष्क जमीन से मिलाओ। यह लेख ह्रदय में ईश्वर के अनुभवों को लेकर जीने वालों के लिए है। मेरे लिए भारतीय होने के क्या अर्थ हैं ? भारतीय वह है जो जीवन का प्रत्येक क्षण उत्सव में जीता है। भारतीय जीवन व्यवस्था समय के अनुसार संसार की सबसे प्रौढ़ परंतु स्वयं जीव...

लकड़ी की चम्मच

उस शहर में हर आदमी के मुँह में लकड़ी की चम्मच लगी थी। बंद मुँह के खुलने का इलाज चम्मच द्वारा ही होता था। जो मरने से बच जाते थे उनका का इलाज चम्मच से मुमकिन था क्योंकि मेरे हुए को बोलने या खाने के लिए मुँह को खोलने की आवश्यकता होती ही नही है। मरे हुओं को दफनाते हुए उनके मुंह मे चम्मच लगा दी जाती थी। उस शहर में आबादी ठीक थी मगर सन्नाटा सा रहता था। घर घर लघु उद्योग की तर्ज पर छोटी छोटी चम्मच बनाने की मशीनें लगी थी जिन पर चम्मच बना बना कर गरीब घरेलू स्त्रियां पेट भरने योग्य पैसा कमा लेती थी। स्त्रियों का काम करना ज़रूरी था क्योंकि सारे मर्द मुह में चम्मच लगाए बुतों की तरह झुंड बनाकर सिर्फ बैठने के काम करते थे हालांकि मुँह से कुछ नही बोलते थे क्योंकि सभी के मुंह मे चम्मच लगी थी।  मुँह का बंद होते जाना एक बीमारी है जिसमे धीरे धीरे मुह का आकार काम होने लगता है और एक दिन मुँह बंद हो जाता है। उससे रोकने के लिए डॉक्टर मुह में चम्मच लगाते है । एक फिर दो फिर तीन ताकि धीरे धीरे बैंड हुआ मुँह खोला जा सके।  उस शहर के सभी मर्दो ने एक समय मे बहुत गुटखा और पान खाया था।

जब लड़ाई पर निबंध लिखने को कहा गया

में इस बात का घोर समर्थक हूँ कि भारत को किसी प्रकार के अनुसंधान की कोई आवश्यकता नही। यहां सब कुछ है। जितनी ज़रूरत थी उतना कर लिया गया था। गोबर के उपलों के अलावा भारत की एक मात्र खोज चारपाई है। मनोरंजन के रोज़मर्रा के उपलब्ध साधनों में एक है लड़ाई।  उत्तर प्रदेश में मोहल्लों की लड़ाइयां पूरे मुहल्ले के लिए अति रुचि का विषय होता है उनके दो पार्टियों को छोड़कर जो लड़ रहे होते है।  इन लड़ाइयों का केंद्र बिंदु नालियां होती है या परचून की दुकान पर बकवास झाड़ते हुए एक को दूसरे की बात बुरी लग जाना। हिन्दू उच्च जातीय वर्ग चूंकि रहने के मामले में सभ्य है इसलिए ये मनोरंजक अवसर उनके बच्चों के नसीब में नहीं आ पाते। इस मामले में हिन्दू निम्न जातियाँ भी किसी हद तक रहना सहना सीख चुकी है। इसलिए भारत मे ये सांस्कृतिक धरोहर सिर्फ मुसलमानों ने सहेज कर रख रखी है गली मोहल्लों की लड़ाइयां एक सतत प्रक्रिया है जो किसी ना किसी जगह चलती ही रहती है। इन लड़ाइयों में गाली गलौच और मार पिटाई से भीड़ का मनोरंजन किया जाता है।  इनके निम्न कारण होते है। 

रोटी की चोरी एक जघन्य अपराध है

रोटी की चोरी एक जघन्य अपराध है चोरी एक जघन्य अपराध इसे कहते हैं न्याय संदिग्ध एक 15 वर्षीय मैक्सिकन जन्मा लड़का था। एक दुकान से चोरी करते पकड़ा गया। पकड़े जाने पर गार्ड की पकड़ से भागने की कोशिश की। यहां तक कि प्रतिरोध के दौरान दुकान का एक शेल्फ भी टूट गया था। जज ने अपराध सुना और लड़के से पूछा ” तुमने वास्तव में कुछ चुरा लिया?” “रोटी और पनीर पैकेट” लड़का स्वीकार करता है। ” क्यों?” “मुझे चाहिए” लड़के ने छोटा जवाब दिया। “ख़रीद लेते” “पैसा नहीं था” “परिवार से ले लेते” ” घर पर केवल माँ है। बीमार और बेरोज़गार। रोटी और पनीर उसके लिए चुराई थी” ” आप कुछ भी नहीं करते हैं?” ” एक कार वाश करता था। माँ की देखभाल के लिए एक दिन छुट्टी की तो निकाल दिया” “आपने किसी से मदद मांगी होगी” ” सुबह से मांग रहा था। किसी ने मदद नहीं की” सुनवाई ख़त्म हुई और जज फैसला सुनाया: चोरी और विशेष रूप से रोटी की चोरी एक जघन्य अपराध है। और इस अपराध के लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। अदालत में हर कोई, मेरे सहित इस चोरी का दोषी है। मैं यहाँ मौजूद हर शख्स पर और अपने आप पर 10 डॉलर का जुर्माना चार्ज करता हूँ। दस डॉलर का भुगतान किए बिन...

भारत मे नए शुद्र आने वाले है

भारत मे जाति का इतिहास पुराना है। यहाँ की जाति व्यवस्था का इतिहास उससे भी पुराना है जितना खुद भारत का इतिहास। जाति व्यवस्था के आरम्भ से अस्तित्व तक पंहुचने का विषय जटिल तो है ही, इतने पुराने ऐतिहासिक स्त्रोतों का ना होना उसे लगभग असंभव बना देता है। अंग्रेजों का भारत मे आना इस व्यवस्था पर चोट थी और हज़ारों साल से दबे कुचले लोगों के लिए स्वतंत्र नायक थे अंग्रेज। अंग्रेजो के आने का नतीजा ये हुआ कि अब ये व्यवस्था मजबूरी में ही सही मगर दिमागों तक सीमित है और आम धरातल पर दम तोड़ रही है। वजह है जिनको शुद्र कहा जाता था अब वो जाग गए। अब वो अफसर भी है, राजनीतिज्ञ भी और कारोबारी भी। अब भविष्य में तो इन लोगों को दोबारा शुद्र बनाना लगभग असंभव है। मगर एक दूसरा सम्प्रदाय है जो शुद्र बनने को आतुर है उस दौर में जब उसे कोई शुद्र नही बनाना चाहता। इस देश मे मुसलमान जिस तरह की आत्मघाती ज़िन्दगी गुज़ार रहा है इसमे कोई संदेह नही कि ये शुद्र हो गया है। पहले शुद्र किस तरह बने ये पता नही मगर इस बार के शुद्र यानी मुसलमान स्वेच्छा से शुद्र बन रहे है। जीवन यानी समय और बुद्धि को जिस तरह मुसलमान क़ौम अपने पैरों तले रौंदत...

कुत्ता

बचपन मे सुनी हुई एक रिवायत ज़हन से गुजरी जिसमे एक सहाबी (ग़ालिबन हज़रत अब्दुर्रहमान बिन ऑफ रज़ियल्लाहु अन्हु) का ज़िक्र था। रावी लिखता है कि उसने अब्दुर्रहमान को सफर के दौरान खाना खाते हुए देखा। पास में उनका कुत्ता बैठा हुआ था। खाने का अच्छा और ज़्यादातर हिस्सा आपन कुत्ते को खिला रहे थे। रावी ने इस अमल का सबब पूछा तो आपने रज़ियल्लाहु अन्हु ने जवाब दिया कि अल्लाह की मख़लूक़ मुझे उम्मीदों से देख रही हो और में बेहतरीन हिस्सा खुद कहा जाऊ। ऐसा कैसे हो सकता है? सिलसिलेवार मुझे उम्र का दजला नहर के पास खड़े कुत्ते से मिसाल देकर समझाना याद आता है। फिर असहाब ए कहफ़ का कुत्ता, याहया अलैस्सलाम का कुत्ता। पता नही कौन सी दुनिया मे खो गया में। घर से निकला तो फिर सड़क से सफेद रंग का कुत्ता आकर पास खड़े हो गया और छूने की कोशिश करने लगा। में उस मासूम के बदन पर अपने आस पड़ोस के लोगों के मारे हुए ज़ख्म देख रहा था और मजबूर था कि उसको एक टुकड़ा खिला सकूं। मुझे उसे कुछ भी खिलाने के लिए अपने घर से दूर ले जाना पड़ता है ताकि कोई देख ना ले। क्योंकि कुत्तों को खाना खिलाना भी उन मेरे आस पास के लोगो के लिए मुझसे लड़ने का एक बहाना बन...
मुँह के बीड़ी जलाता हुआ हाजी लल्लू ठेकेदार अपने गंजे सिर पर हाथ फेरता चला आ रहा था। प्रोफेसर मित्तल को देखकर रुक गया, फिर मूछें मोड़ते हुए बोला, " और प्रोफेसर साब क्या हाल हैं ??"। प्रोफेसर मित्तल ने जवाब दिया," ठीक है भाई तुम बताओ कैसे हो? कहाँ से आ रहे हो?"। तभी दिल्लू (दिलनवाज़ ठेकेदार, सट्टे का अड्डा चलाने वाला) भी हाजी लल्लू को देखकर रुक गया और दोस्ताना अंदाज़ में बड़े खुशमिजाजी से लल्लू से हाल चाल पूछने लगा,"और बे भो..... के कहाँ ........रहा है आजकल।" इसी प्यार के लहजे में लल्लू और दिल्लू की बातें आगे बढ़ती चली गयी। प्रोफेसर मित्तल वहीं खड़े रहे और फिर वहां से निकलने के लिए मुड़े और चल दिये। मुड़ते मुड़ते उनके कान में लल्लू ठेकेदार की एक बात सुनाई पड़ी। "अबे मिझे तो अमेरिका की सरकार चिपटरी नागरिकता देने कु, पर भाई अपना घर ना छोड़ा जावे, मेरे सट्टे के काम की तरक़्क़ी देखकर हारवर्ड यूनिवर्सिटी अवार्ड देवे"। मित्तल जी के कान खड़े हो गए। और चोंक उठे। "अमेरिका की सरकार ????" प्रोफेसर मित्तल को इस बात का अचम्भा नही था कि लल्लू ने इतनी बड़ी ढींग क्यों ह...